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विज्ञान की उपयोगिता का सबसे उत्तम कारण
July 18, 2020 • प्रवीण श्रीवास्तव • Education/Science & Technology
विज्ञान को समाज में मिलने वाले महत्व का कारण  वैज्ञानिक ज्ञान के अनुप्रयोग का बहुत सी बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने और जीवन स्तर में सुधारने में मिली मदद है। उदाहरण के तौर पर क्षय रोग, चेचक , पोलियो जैसे रोगों का इलाज  खोज पाने और मानवीय क्रिया कलाप के लिए ऊर्जा का भरोसेमंद स्रोत खोजना विज्ञान की उपलब्धि के रूप में गिनी जा सकती है । इसी तरह, विज्ञान को अक्सर आर्थिक विकास को चलाने के रूप में जनता के लिए उचित ठहराया जाता है, जिसे सार्वजनिक धन के लिए निवेश पर रिटर्न के रूप में देखा जाता है। हालांकि पिछले कुछ दशकों के दौरान  विज्ञान का एक और लक्ष्य सामने आया है वह है अपनी निरंतरता और मानवता की निरंतरता की गारंटी के लिए प्राकृतिक संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग करने का एक तरीका खोजना , एक प्रयास जिसे वर्तमान में "स्थिरता" ( sustainability) कहा जाता है।
 
विज्ञान के कार्यों को अक्सर ऐसे तर्कों का उपयोग करके  सही ठहराया जाता हैं- जो कि वर्तमान में मानव स्वास्थ्य और लंबे जीवन की अवसर, तकनीकी प्रगति, आर्थिक लाभ, और  स्थिरता ( sustain ) से जुड़े हुए होते हैं  ताकि शोध कार्यों के लिए सार्वजनिक धन की उपलब्धता  सुनिश्चित की जा सके और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त की जा सके। वे बताते हैं कि आज हम जो भी उपकरण, तकनीक और दवाइयां इस्तेमाल करते हैं वे सब वैज्ञानिक शोध के परिणाम हैं, सुई से लेकर हवाई जहाज और एस्पिरिन से लेकर बाईपास सर्जरी तक। 
 
यद्यपि ये सब बातें अपनी जगह सही हैं मगर विज्ञान का एक और अनुप्रयोग भी है जिसे काफी हद तक नजरअंदाज किया जाता रहा है। वर्तमान समय की शिक्षा में मानवता के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने की  बहुत अधिक क्षमता है। यह गंभीरता से विचार करने का समय है कि विज्ञान और अनुसंधान,  समाज के सभी स्तरों पर शिक्षा में कैसे योगदान कर सकते हैं। केवल अधिक लोगों को अनुसंधान में शामिल करना और उन्हें वैज्ञानिक ज्ञान के बारे में सिखाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को विशेष रूप से उन्हें यह समझना कि विज्ञान ने कैसे दुनिया और मानव सभ्यता को आकार दिया है। अगले दशकों में शिक्षा ही विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोग बन सकता है।
नागरिकों की अधिक और बेहतर शिक्षा भी नई प्रौद्योगिकियों के उचित और स्थायी अनुप्रयोग के बारे में जागरूक बहस और निर्णय लेने में सक्षम होगी, जो सामाजिक असमानता और वैज्ञानिक खोजों के दुरुपयोग जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करेगी। उदाहरण के लिए, एक अपर्याप्त शिक्षित व्यक्ति मानव कल्याण और जीने कि प्रत्याशा में वृद्धि को ही एक उत्तम लक्ष्य मान सकता है पर हो सकता है कि वह खाद्य आपूर्ति और स्वास्थ्य संसाधनों से संबंधित असमानता की वर्तमान समस्याओं पर विचार ही नहीं करे।
 यह देखते हुए कि विज्ञान शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए  कि  मानव स्थिति को सुधारने के लिए विज्ञान ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पर साथ हूं वैज्ञानिक ज्ञान कैसे लागू किया जाए  इस पर सवाल उठाने लगा है कि क्या विज्ञान अनुसंधान पूरी तरह से मानवीय जरूरतों की सेवा में होना चाहिए, अथवा वैज्ञानिकों को ज्ञान का अर्जित करने की स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहिए । ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी जॉन डी. बर्नाल की पुस्तक, द सोशल फंक्शन ऑफ साइंस के प्रकाशन( 1939) के बाद से इस सवाल पर गंभीर बहस हुई थी। बर्नल ने तर्क दिया कि विज्ञान को सामान्य मानव जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने में योगदान देना चाहिए और राज्य द्वारा इसकी उपयोगिता को अधिकतम करने के लिए इसे केंद्र द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए - वह मार्क्सवादी विचार से काफी प्रभावित थे।  जबकि प्राणी विज्ञानी जॉन आर. बेकर ने विज्ञान की "उदार" अवधारणा के पक्षधर थे और वे "बर्नलिस्टिक" दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए , "वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा ज्ञान की उन्नति अपने आप में एक मूल्य है" इस धारणा की वकालत करते हैं। इस दृष्टिकोण को "मुक्त-विज्ञान" का दृष्टिकोण कहा जाता है।
 
आधुनिक, उपयोगितावादी दृष्टिकोण ने विज्ञान को निरा सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक दिशा निर्देश से संचालन का प्रयास किया है। 
यह तथाकथित विकसित दुनिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में एक आम दृष्टिकोण है। भारत सरकार के विज्ञान और तकनीकी विभाग द्वारा प्रतिपादित विज़न TV2035 भी इस प्रकार के विकास मॉडल पर आधारित डॉक्यूमेंट है जिसमें विज्ञान की शोध को उनकी उपयोगिता और आर्थिक लाभ से जोड़ा गया है।
 इसके विपरित यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन ने घोषणा की कि इसका मिशन "विज्ञान की प्रगति को बढ़ावा देना" है; राष्ट्रीय स्वास्थ्य, समृद्धि और कल्याण को आगे बढ़ाने के लिए; राष्ट्रीय रक्षा को सुरक्षित करने के लिए; और अन्य उद्देश्यों के लिए "। इसी तरह जापान विज्ञान और प्रौद्योगिकी एजेंसी (JST) उद्घोषणा करती है कि यह "बुद्धि के निर्माण, समाज के साथ बुद्धि के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य को समर्पित है, और एक एकीकृत तरीके से अपने बुनियादी ढांचे की स्थापना और नवाचार की पीढ़ी का समर्थन करती है"। अपने राष्ट्रपति के संदेश में, मिचियारू नाकामुरा ने कहा कि, "जापान नवीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आधार पर नए मूल्य बनाने और जापान की प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए मानव समाज के निरंतर विकास में योगदान करना चाहता है"। 
पूंजीवादी उपकरण के रूप में विज्ञान की TV 2035 कार्यक्रम की अवधारणा "बर्नलिस्टिक" दृष्टिकोण के अनुरूप है और "उदार" दृष्टिकोण से विरोधाभासी है कि "विज्ञान केवल स्वतंत्रता के माहौल पनप सकता है"।  इसलिए शोध के लिए धन उपलब्ध कराया जाता है तो केवल समाज को अधिकतम आर्थिक और व्यावहारिक लाभ को दृष्टि में रखा जाता है। स्पष्ट रूप से अनुसंधान का मर्केंटीलाइजेशन इस सरल विचार पर आधारित है कि आर्थिक विकास से जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि होती है। हालांकि, कुछ प्रमुख अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि सामाजिक कल्याण और खुशी को मापने के लिए सामान्य आर्थिक संकेतकों, जैसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का उपयोग करना त्रुटिपूर्ण है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के रॉबर्ट कोस्टान्ज़ा और कई सहयोगियों ने हाल ही में नेचर में एक पेपर प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने "जीडीपी की अनुपयोगिता की घोषणा की और इसके लिए अधिक उपयुक्त संकेतकों द्वारा प्रतिस्थापन किया जो आर्थिक विकास और "जीवन की उच्च गुणवत्ता" पर विचार करते हैं, जो कि समान रूप से यूनिवर्सल और टिकाऊ है । 
 
यदि एक आर्थिक उपकरण के रूप में विज्ञान का उपयोगितावादी दृष्टिकोण प्रबल होता है, तो बुनियादी शोध को नुकसान होगा। इस तरह से वैज्ञानिक अनुसंधान के बुनियादी ढांचा  को समाप्त करना, जो सदियों में निर्मित हुआ है और उन्मुक्त जिज्ञांसाओं पर आधारित है, तो उसका परिणाम मानवता के लिए भयावह होंगे। वैज्ञानिक शोध के इस संरचनात्मक परिवर्तन के खतरे को राजनीतिक और वैज्ञानिक प्रबंधकों को समझाने की जरूरत है। और तब यह और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब  कि हाल ही में यूरोबोमीटर के एक सर्वेक्षण में यूरोपीय जनता के बीच वैज्ञानिकों को इस बात के लिए महत्वपूर्ण समर्थन मिला कि वे "अपनी इच्छानुसार अनुसंधान करने के लिए स्वतंत्र हैं, बशर्ते वे नैतिक मानकों का सम्मान करें" ।
ऐसा लगता है कि वर्तमान फ्री-साइंस सिस्टम जो सार्वजनिक बजट के साथ वित्त पोषित हो  का समर्थन करने के लिए एक अभियान, संभवतः  लोकप्रिय होगा।
 
बच्चों द्वारा उपयोग की जाने वाली पाठ्यपुस्तकों पर एक नज़र डालना यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि कुछ ही पीढ़ियों में वैज्ञानिक ज्ञान कितना उन्नत हो चुका है, और इस अर्जित ज्ञान को शिक्षा में कैसे स्थानांतरित किया गया है। एक क्लासिक उदाहरण है  आणविक जीव विज्ञान का, एक शाखा जो लगभग एक पीढ़ी पहले स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से अनुपस्थित थी। शिक्षा को बढ़ाने के लिए नए वैज्ञानिक ज्ञान का जानबूझकर और सुसंगत जोड़ विज्ञान का एक स्पष्ट अनुप्रयोग  है। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में विज्ञान के  सही ढंग से अनुप्रयोग पर दो कारणों  से जोर दिया जाना चाहिए: पहला, क्योंकि शिक्षा को मानव अधिकार के रूप में समान रूप से मान्यता दी गई है, और दूसरी, क्योंकि विज्ञान के चिकित्सा, तकनीकी और पर्यावरणीय अनुप्रयोगों के लिए योग्य पेशेवरों की आवश्यकता होती है जो औपचारिक शिक्षा के माध्यम से अपने कौशल का हासिल करते हैं। इसलिए, शिक्षा एक सर्वोपरि वैज्ञानिक अनुप्रयोग है।
अधिक सामान्य अर्थों में, शिक्षा मानव संस्कृति की पहचान को बनाए रखने का कार्य करती है, जो हमारे संचित ज्ञान पर आधारित है, और समाज के सामान्य सांस्कृतिक स्तर को सुधारने के लिए है। नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ कर्मचारी और वर्तमान में विज्ञान और मानव मूल्यों के लिए संस्थान के अध्यक्ष,वैज्ञानिक स्टुअर्ट जॉर्डन के अनुसार, व्यापक अज्ञानता और अंधविश्वास  अधिक मानवतावादी दुनिया में प्रगति के लिए प्रमुख बाधाएं हैं। समृद्धि, सुरक्षा, न्याय, अच्छा स्वास्थ्य और संस्कृति तक पहुंच सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से सुलभ होनी चाहिए। उनका तर्क है कि वैज्ञानिक ज्ञान के अवांछनीय परिणामों का प्रसार - जैसे कि अतिप्रयोग, सामाजिक असमानता, परमाणु हथियार और वैश्विक जलवायु परिवर्तन आदि, प्रबुद्धता के प्रमुख सिद्धांत "मानवतावादी ढांचे के तहत विज्ञान का उपयोग" का परित्याग करने के कारण हुआ है। 
शिक्षा की चर्चा करते समय, इसलिए हमें न केवल उन लोगों पर विचार करना चाहिए जिनकी बुनियादी शिक्षा तक कोई पहुंच नहीं है, बल्कि विकसित देशों की आबादी का भी काफी हिस्सा है जिनके पास विज्ञान की शिक्षा नहीं है। यूरोबैरोमीटर सर्वेक्षण का बताता है कि औसतन यूरोपीय लोगों में से केवल आधे ही जानते थे कि इलेक्ट्रॉन परमाणुओं से छोटे होते हैं, और लगभग एक तिहाई का मानना ​​था कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। 
मानव समाज के सांस्कृतिक स्तर को सुधारना एक दीर्घकालिक उद्यम है जिसमें विज्ञान को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। हमें पहले यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि वैज्ञानिक तर्क विधा मानव स्वभाव से सहज रूप से जुड़ा हुआ है: मानवता ने स्पष्ट रूप से विज्ञान को अनेक धारणाओं के समूह के बीच से चयन करने के बाद ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनपसंद उपकरण के रूप में नहीं अपनाया बल्कि इसे हमने दुनिया को समझाने के लिए बस अपनी कौतूहल और अन्वेषी मानसिकता के चलते स्वाभाविक तौर पर इस्तेमाल किया। यदि खोज करना एक सार्वभौमिक मानव विशेषता है, तो किसी भी विज्ञान- तकनीक  को, ठीक कला या संगीत की तरह, बिना बाधा के हर किसी के द्वारा प्रसारित और समझा जा सकता है ।
 
इसके अलावा, विज्ञान ने प्रदर्शित किया है कि यह दुनिया को समझाने, समस्याओं को हल करने और मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए एक सर्वोच्च तंत्र है। विज्ञान का मूल स्वभाव इसकी गतिशील प्रकृति है: मौजूदा ज्ञान का निरंतर संशोधन और पुनर्मूल्यांकन। हर वैज्ञानिक सिद्धांत हमेशा जांच के दायरे में रहता है और जब भी नए साक्ष्य इसकी वैधता को चुनौती देने लगते हैं तो उनसे पूछताछ की जाती है। किसी अन्य ज्ञान प्रणाली ने इस क्षमता का प्रदर्शन नहीं किया है, और यहां तक ​​कि, विश्वास-आधारित प्रणालियों के रक्षक चिकित्सा सेवाओं और तकनीकी सुविधाओं के सामान्य उपयोगकर्ता हैं जो वैज्ञानिक ज्ञान से उभरे हैं।
 
इन कारणों के चलते, प्राथमिक विद्यालय से हाई स्कूल तक औपचारिक शिक्षा द्वारा युवाओं को यह पढ़ाने के साथ  कि "विज्ञान ने मानव संस्कृति और कल्याण को कैसे आकार दिया और उन्नत किया है" यह भी बताना चाहिए  कि विज्ञान सबसे अच्छा तब फलता-फूलता है जब वैज्ञानिक - शोधार्थियों  को उनके शोध के क्षेत्र को चुनने की स्वतंत्रता होती है। इसका मतलब यह भी है कि हमें शिक्षकों को शिक्षित करने की आवश्यकता है और इसके परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय शिक्षा विभागों में पर्याप्त विज्ञान पाठ्यक्रम अपनाने को प्रोत्साहित करना होगा। स्वयं वैज्ञानिकों को स्कूलों और विश्वविद्यालयों दोनों में अधिक शामिल होना चाहिए। वैज्ञानिकों को सामान्य रूप से समाज के साथ अधिक जुड़ना होगा। मानव संस्कृति और समाज का सुधार संरचनात्मक और कार्यात्मक पैटर्न पर अधिक निर्भर करता है। विज्ञान के मामले में, आम जनता के लिए इसका प्रसार आमतौर पर विज्ञान का लोकप्रियकरण कहा जाता है और इसमें पत्रकारों और अन्य संचारकों के बजाय स्वयं वैज्ञानिक शामिल होना ज्यादा श्रेयकर होगा। इस प्रयास में, वैज्ञानिकों को सक्रिय और बड़े पैमाने पर शामिल होना चाहिए। वैज्ञानिक- विशेष रूप से सार्वजनिक संस्थानों में काम करने वाले - समाज को यह बताने के लिए अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए कि विज्ञान क्या है और क्या नहीं है; यह कैसे किया जाता है; इसके मुख्य परिणाम क्या हैं; और वे किसके लिए उपयोगी हैं। यह समाज की वैज्ञानिक साक्षरता को उन्नत करने का सबसे अच्छा तरीका होगा।
औपचारिक विज्ञान शिक्षा पर अधिक जोर देते हुए और समाज के सामान्य वैज्ञानिक सोच के स्तर को ऊपर उठाने के लिए एक अधिक प्रबुद्ध ज्ञान-आधारित वैज्ञानिक समुदाय का नेतृत्व करना चाहिए ।  विज्ञान  मानवता के लिए केवल इसलिए आवश्यक नहीं ह कि वह सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक रूप, अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों में, लाभकारी है; बल्कि इसलिए भी कि यह ज्ञान की मानव कि भूख को संतुष्ट करने के लिए भी उपलब्ध सबसे अच्छा साधन है।