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शब्द : “ प्रवासी”
May 23, 2020 • अल्का यादव अग्रवाल

शब्द : “ प्रवासी”

अर्थ :१. परदेस में रहने वाला ( आदर्श हिंदी शब्दकोश)
अर्थ :२.अपना मूलस्थान छोड़कर अन्य स्थान में बसने वाला ( गूगल)

विदेश में रहने वाले भारतीयों को ‘ प्रवासी भारतीय’ कहा जाता है, ये बात समझ में आती है , परंतु अपने ही देश में, दूसरे प्रदेशों में काम करने वाले मज़दूरों को ये नाम एक गाली की तरह क्यों दिया जा रहा है, ये मेरी समझ से परे है .......
विदेश से लौटने वालों का सम्मान और अपने ही देश में घर जाने वालों का तिरस्कार। 
सरकार की नाकामी को ढकने के लिये मीडिया हर प्रकार के पैंतरे अपना रहा है । पहले जमाती, फिर शराबी, अब जब यह मज़दूरों का जन सैलाब नहीं संभल पाया तो बीमारी फैलाने का दोष इनके सिर.

सारा दिन टी.वी पर “ प्रवासी” शब्द ऐसे गूँजता है, मानो ये इंसान नहीं, बीमारी फैलाने वाले कीटाणु हैं । ऐसे प्रतीत होता है कि जमाती, शरीबी, और ये मज़दूर ना होते तो कोरोना हमारे देश की तरफ आँख उठा के भी न देखता । कब से गाना गा रहे हैं कि पूरी तैयारी है, लाखों करोड़ का पैकेज, लाखों करोड़ के वेंटिलेटर, टेस्ट किट, पीपीई, इत्यादि, लाखों टन अनाज गरीबों में वितरित..... पर ज़मीनी हक़ीकत सामने आते ही कलई खुल गई !!!!! बस, फिर रोना शुरू .....

ऐसी भी किया तैयारी की थी भाई जो आवश्यकता पड़ने पर नज़र ही नहीं आ रही।।

विपक्ष सवाल करे तो आपदा में साथ नहीं दे रहा, साथ देने का, राजनीति से परे मदद का हाथ बढ़ाने का प्रयास करे तो, विपक्ष राजनीति कर रहा है ।
पहले बिना सोचे समझे लाकडाउन, फिर ध्यान भटकाने और पैसों के लिये शराब की दुकानें खोलना, अब ये पलायन ना संभाल पाना.... 
फिर आधी आबादी को घर में बंद करके, आधों को बाहर छोड़ देना, क्या समझदारी है इसमें??? दो महीने का नुक्सान, मेहनत, सब बेकार। 
समझ में इनकी कुछ आ नहीं रहा, संभाल पा नहीं रहे, बस दूसरों पर दोषारोपण और माडिया के माध्यम से लीपापोती।

जिन्होंने दूसरे देशों में प्रताड़ित और अपने देश में डर या लालच के कारण धर्म परिवर्तन करने वाले हिंदुओं की हर हाल में घर वापसी की भीष्म प्रतिज्ञा ली थी वो अपने ही देश के ग़रीब मज़दूरों को सुरक्षित उनके घर ना पहुँचा पाये।

भारत का संविधान देश के हर नागरिक को एक समान मानता है और सबको देश के किसी भी स्थान पर जाने,रहने, पढ़ने, कार्य करने की स्वच्छंदता देता है, तो अपने ही देश में ये “ प्रवासी” का तमग़ा क्यों???

और यदि अपने मूल प्रदेश अथवा जन्मस्थान से दूर जाने वाले ये मज़दूर प्रवासी हैं, तो फिर रोज़ी रोटी, नौकरी,शिक्षा, व्यापार,विवाह, या अन्य कारणों से देश के दूसरे हिस्सों में बसने वाले, व्यापारी, डाक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, विद्यार्थी, सरकारी कर्मचारी, देश के विभिन्न कोनों से चुनाव जीतकर दिल्ली आये सांसद, मंत्री, मशहूर खिलाड़ी, फिल्मस्टार भी उतने ही प्रवासी हैं । मज़दूर यदि गाँव या छोटे शहर से बड़े शहर जाता है तो क्यों गुनाहगार, जबकि अन्य गणमान्य ???
जिंदादिल कहे जाने वाले, चकाचौंध से भरपूर ये बड़े शहर इतने बेदिल और कठोर निकलेंगे इन मज़दूरों ने कभी नहीं सोचा होगा। 

हर किसी की अपनी इच्छा है कहीं रहने या बसने की ....... किसी को कमाई, किसी को संसाधन, किसी को लोग,किसी को आबोहवा रास आती है किसी स्थान की....... मज़दूर को तो बस परिवार के लिये रोटी की चाह खींच लाती है अपनों से दूर ...
उनको कौन सा प्रधान मंत्री बनना है। 

देखा जाये तो किसी प्रदेश में १५ साल राज करने के बावजूद, प्रचंड बहुमत का विश्वास होने के बावजूद... साबरमती का आँचल छोड़ , माँ गंगा की शरण में अपना प्रदेश छोड़कर दूसरे प्रदेश आया था कोई, तो ये परिभाषा इनपर भी लागू होती है क्या। “ प्रवासी” 

एक पैदल यात्रा 1930 में हुई थी, साबरमती आश्रम से डांडी, मात्र 340 कि.मी , ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह का प्रारंभ, जिसने सशक्त सरकार को नाकों चने चबवा दिये थे... जिसने आगे जाकर विराट विद्रोह का रूप लिया था। 

ये यात्रा तो हज़ारों मील पैदल की है..... देखिये किसको कहाँ पहुँचायेगी । ये हज़ारों मील, पैदल,भूखे प्यासे, तिरस्कृत लोग, आँखों में जीवन के टूटे स्वप्नों के चुभते हुये टुकड़े लिये, बिलखते बच्चे, लाचार बुज़ुर्गों की करुणा का बोझ उठाये, पैरों के छालों से रिसते खून की जो रेखा खींचते जा रहे हैं, वो आसानी से नहीं मिटेगी.... इसका हिसाब तो एक दिन ज़रूर करेगी कुदरत,
बेशर्म लोग, इन्हीं रेखाओं के सहारे वोट माँगने पहुँच जायेंगे शायद। 

साहब ने पाकिस्तान में कुछ देर पहले हुये विमान हादसे पर ट्वीट किया , विराट कोहली के शतक पे, दीपिका - रणवीर की, प्रियंका - निक की शादी पर, टी आर पी बढ़ाने वाली हर बात पे वो चिड़िया उड़ा देते हैं...... पर देश की रीढ़, जवान, किसान और मज़दूरों के लिये शब्द नहीं इनके पास😞
इन सबकी जान का कोई मोल नहीं इनके लिये, इनकी गिनती तक नहीं । भाषणों में ये कहने वाले कि देश के हर गरीब को हवाई जहाज़ पर बैठाना चाहते हैं, दुनिया की सैर कराना चाहते हैं, ग़रीब को घर जाने के लिये साधन तो दूर, उसकी लाश ले जाने के लिये एक ठेला तक ना दे सके। 

शर्मनाक राजनीति और स्वार्थ की पराकाष्ठा।