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मानवता के प्रकाश स्तंभ : बुद्ध , गांधी और आइंस्टाइन
September 19, 2020 • प्रवीण श्रीवास्तव
मानवता के प्रकाश स्तंभ.... बुद्ध, गांधी और आइंस्टाइन :
मानव इतिहास सदा से महापुरुषों से प्रेरित होती रही है और ऐसे महापुरुषों की लंबी श्रृंखला है मगर वर्तमान समय के संदर्भ में यदि बात हो और उनमें से कुछ प्रमुख को चुनना हो तो मै बिना झिझक बुद्ध, गांधी और आइंस्टाइन को चुनूंगा ।
मानव सभ्यता को प्रभावित करने वाले सबसे बड़े कारक धर्म , राजनीत और विज्ञान रहे हैं। आप कह सकते हैं कि व्यावसायिक गतिविधियां भी सभ्यता को आकार देने वाला महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन वह व्यक्ति विशेष से प्रेरित होने के बजाय आवश्यकता और संसाधनों पर आधारित होती है। तो इन आधार घटकों की ही बात करते हैं।
धर्म मनुष्य की आत्मा के सबसे समीप बसने वाली सत्ता है। यह उसकी आस्था और जीवन दर्शन को निर्धारित करने वाला है।अपने सारे इतिहास में मनुष्य की आस्था ने किसी न
 किसी धार्मिक विश्वास की शरण जरूर ली है। इस शरण ने जिंदगी के कष्टों से थोड़ी राहत जरूर दी है मगर बदले में उसने मनुष्य के उन्मुक्त जीवन और नैसर्गिक सोच दबा दिया। इतिहास में कितने  ही प्रतिभाशाली व्यक्ति धर्म की बलि चढ़ चुके हैं।( गैलीलियो  को चर्च से माफी मांगनी पड़ी तो कॉपरनिकस को मौत की सजा मिली, सलमान रुश्दी सैटनिक वर्सेस लिखने के कट्टरपंथियों के निशाने पर ऐसे आए कि वे घर में कैद हो कर रह गए। भारत में कुलबर्गी , दाभोलकर जैसे कितनों ने ही अपने स्वतंत्र विचारों के कारण जान गंवाई।)
दुनिया के सभी धर्म गुरुओं ने मनुष्य को विश्वास करना सिखाया है, स्वयं को ईश्वर का अवतार या ईश्वर का भेजा दूत या मसीहा या फिर ईश्वर का एकमात्र पुत्र होने का विश्वास, अपनी शिक्षाओं पर आंख मूंद कर भरोसा करने का विश्वास जो कि मनुष्य के तारने का एकमात्र तरीका हो सकता है। धर्म के झगड़े के मूल में यही कारण है कि सिर्फ उनके धर्म का रास्ता सही है दूसरे का नहीं , केवल हम ही मनुष्य को मुक्ति दिला सकते हैं दूसरा तो सिर्फ गुमराह कर रहा है। महात्मा बुद्ध और उनका धर्म इस भीड़ से अलग दिखता है । बुद्ध अपने मार्ग को कभी विशिष्ट नहीं कहते न कभी अपने को ईश्वर का अवतार , दूत या पुत्र नहीं कहते । वे तो ईश्वर के प्रश्न पर बिल्कुल मौन हैं , उनके लिए ईश्वर का होना न होना महत्वपूर्ण नहीं है। उनका आग्रह केवल सत्य की खोज का है। वे अपने मार्ग को आजमाने को कहते हैं मानने के लिए नहीं। ऐसी स्वतंत्र और प्रगतिगामी विचार धारा ही भविष्य की मानव सभ्यता की आस्था का आधार नहीं होना चाहिए जो किसी सत्ता , किसी स्थापित मान्यता को स्वीकार किए बगैर मनुष्य को नए रास्ते आजमाने और पुराने रास्ते जांचने की स्वतंत्रता देता हो ? धर्म को जन्मजात जुएं की तरह ढोने के बजाए भविष्य की सभ्यता को धर्म को व्यक्तिगत चुनाव के रूप में स्वीकारना चाहिए ।  बुद्ध ने धर्म के उत्कृष्ठतम रूप को प्रतिपादित किया है।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में दुनिया ने बड़े साम्राज्यों और उपनिवेशों के साथ ही नई राजनीतिक चेतना के उदय देखा। शोषण और दमन के खिलाफ दुनिया ने पिछली दो सदियों में जितनी क्रांतियां देखीं मानव इतिहास में पहले शायद ही कभी देखीं गई होंगी। परिणाम स्वरूप नयी नयी राजनीतिक विचारधाराओं का जन्म हुआ। रूस में बोलस्विक क्रांति ने जार शासन को उखाड़ फेंका, तो फ्रांस में नागरिक स्वतंत्रता और समानता की चेतना ने राजतंत्र का खात्मा कर दिया। इसी तरह अमेरिका , लैटिन अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौतियां मिल रही थी। ये भले दुनिया के अलग अलग जगहों पर हो रही थीं मगर उन सब में एक समानता थी और वो थी उग्रता और खूनी संघर्ष जिसे एक तरह से आम स्वीकृति भी मिल चुकी थी।
 ऐसे रक्तरंजित युग में औपनिवेशिक भारत ने एक अनूठे राजनीतिक प्रयोग का साक्षी बना। एक पतला दुबला कमजोर सा आदमी जो किसी आम आदमी में भी बहुत आम जान पड़ता था ने अपनी ही तरह की राजनीति से दुनिया के सबसे शक्तिशाली ब्रितानी साम्राज्य की नींव हिला दी। मोहनदास कर्मचंद गांधी ने जो राजनीतिक हथियार चुना  उससे दुनिया तब तक अपरिचित थी। गांधी का सत्य के लिए अटूट निष्ठा और अहिंसा का अडिग पालन ने सत्याग्रह का वह आंदोलन खड़ा कर दिया  जिसने निर्दयी शासकों के पसीने छूटा दिए। राष्ट्रव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलनों ने सरकारी मशीनरी जाम कर दी और आखिरकार भारत को आजादी हासिल हुई। पर ऐसे अनुशासित सत्याग्रहियों की फ़ौज तैयार करने के लिए सत्य और अहिंसा को केवल खोखले शब्दों से नहीं बल्कि उसे अपने जीवन में उतारने का साहस चाहिए जो गांधी ने किया। गांधी ने दुनिया के तमाम आंदोलनों की प्रेरणा बन चुके हैं। अफ्रीका के नेल्सन मंडेला हों या अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग सबने  गांधी के सत्याग्रह की शक्ति को माना है। अभी हाल में भारत में NRC का विरोध प्रदर्शन हो , चीन में ताइवान की स्वायतता पर नागरिक आंदोलन या अमेरिका में काले लोगों के अधिकारों पर शुरू हुआ ब्लैक लाइफ मैटर्स आंदोलन हो, गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा, दुनिया भर में नागरिक आंदोलनों के हथियार बन रहे हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि गांधी की प्रसांगिगता और स्वीकारिता पूरे विश्व में समय के साथ बढ़ती जा रही है।
आधुनिक काल के सबसे प्रभावी और सर्वस्वीकार्य क्षेत्र यदि कोई है तो वह विज्ञान है। यूरोप में पंद्रहवी सदी से वैज्ञानिक अनुसंधानों का जो सिलसिला शुरू हुआ है वह पूरे मानव जीवन के लिए गौरवपूर्ण है। इन खोजों ने केवल हमारा जीवन आसान बना दिया है बल्कि दुनिया और ब्रह्माण्ड की हमारी समझ को भी नई ऊंचाई तक ले गई है और यह लगातार जारी है। बहुत से वैज्ञानिकों कि अद्भुत अन्तर्दृष्टि और तीक्ष्ण बुद्धि वास्तव में हमे विस्मित कर देती है मगर यदि इनमें से किसी एक को चुनने को कहा जाए तो यह बहुत मुश्किल काम है। अलबर्ट आइंस्टीन पिछली सदी के वह वैज्ञानिक हैं जिन्होंने विज्ञान के संबंध में हमारी परंपरागत भले ही  सोच को बदल दिया। सन 1905 में उनके प्रकाशित चार पेपरों - अणु गति सिद्धांत ,प्रकाश विद्युत प्रभाव , उर्जा - द्रव्यमान संबंध और विशिष्ठ सापेक्षता का सिद्धांत और 1915 में उनकी सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत ने भौतिक विज्ञान की मूल अवधारणाओं में आमूलचूल परिवर्तन ला दिया। किसी एक विज्ञानिक द्वारा एक व्यापक विज्ञानिक क्षेत्र में ऐसी लंबी छलांग वास्तव में हैरान कर देती है। आइंस्टीन का व्यक्तित्व बहु आयामी था। वो एक प्रतिभावान संगीतकार के साथ ही,  सार्वजनिक  जीवन में वे बेबाक और शोषण के खिलाफ खड़े होने वालों में थे।  अमेरिका में वे काले लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले नागरिक संगठनों के सदस्य रहे। वैज्ञानिक बुद्धि और संवेदनशील हृदय के ऐसे व्यक्ति मनुष्यता के लिए वरदान होते हैं। 
इतिहास और वर्तमान शोषण , लालच , प्रकृति के दोहन , युद्धों , भयंकर असमानता , अत्याचार से पटा पड़ा है। मगर यदि हम भविष्य में बेहतर सभ्यता का सपना देखते हैं तो हमें उन प्रकाश स्तंभों की जरूरत होगी जो सही राह दिखा सके। इन महापुरुषों के मार्गों का एकाकार में वह संभावना छिपी हुई है जिसे साकार करने की जरूरत है।