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कोरोना संकट, स्वास्थ से जादा आर्थिक और सामाजिक विपदा
June 7, 2020 • प्रवीण श्रीवास्तव
भारत में करोना संकट स्वास्थ संकट से ज्यादा करोङों लोगों के लिए आर्थिक सामाजिक विपदा बनकर उभरी है। लोगों की कमाई बंद हो चुकी है और भविष्य अँधेरा दिख रहा है। जिस स्थिति में खाने पीने  का इंतजाम भी मुश्किल हो गया हो भला बच्चों की पढाई पर पैसे खर्च करने की कौन सोंचे। अगर बच्चों का स्कूल लम्बे समय के लिए छूटा और वे पढाई से मुक्त हो गए तो उनकी नियति श्रम बाजार के बाल श्रमिक बनने के अतिरिक्त क्या होगी ?वैसे ही , देश में बड़ी संख्या में बाल मज़दूरी जारी है जबकि संविधान के अनुच्छेद 24 द्वारा बाल श्रम पर प्रतिबन्ध है। इन विकट परिस्थितिओं में गरीब परिवार के बच्चों को बाल श्रम की अंधी गली में जाने से बचाना बहुत बड़ी चुनौती साबित होगा।  
यह तो अच्छा हुआ की लॉक डाउन शैक्षणिक सत्र की समाप्ति पर लागू हुआ। और ज्यादातर स्कूल परीक्षा ले चुके थे। उत्तर प्रदेश  सरकार ने आठवीं तथा 9 वीं और 11 वीं तक के  सभी बच्चों को पास कर देने का निर्णय लिया। 
अप्रैल से मई के मध्य तक चलने वाला नए शिक्षा सत्र का समय तो लॉक डाउन में ही गुजर गया।  इस दौरान महंगे प्राइवेट स्कूल और कुछ सरकारी स्कूलों ने ऑनलाइन कक्षाएं प्रारम्भ की हैं , जिनमे  नए प्रयोग की उत्सुकता और कौतूहल  ज्यादा पर गुणवक्ता कम दिखी। अब जब लॉक डाउन अपने अंतिम दौर में पहुंच रहा है और जून का महीना गर्मियों की छुट्टी मे गुजर जायेगा। इसके बाद बच्चों की पढाई कैसे होगी, क्या स्कूल सामान्य तौर पर चलेंगे या जैसा की अभी चल रहा है घर से ही ऑनलाइन कक्षाएं चलेंगी, या जैसा कुछ लोग सुझा रहे हैं कि बच्चों की आधी संख्या पर स्कूल खोल दिए जाये। बाजारों और दूसरे प्रतिष्ठाओं के बारे में लिए  निर्णयों को देखते हुए स्कूलों को कुछ शर्तों के साथ खोल देने की सम्भावना ही अधिक लगती है। 
किसी भी स्थिति में साधन - सुविधा संपन्न लोगों के बच्चों की पढाई पर कोई खतरा नहीं है , कुछ मुश्किलें जरूर होंगी जिनका समाधान कीमत चूका कर किया जा सकता है।  मुसीबत केवल उनके लिए है जो कीमत देने में असमर्थ हैं।  बहुत से परिवार जो अपने बच्चों के अच्छे भविष्य का सपना पाले अभी तक बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज रहा था पर अब इन स्कूलों की फीस का खर्च उठा पाना मुश्किल हो जायेगा। ऐसी परिस्थियों में सरकारी स्कूलों में भेजना ही विकल्प बचेगा , मगर सरकारी स्चूलों की संख्या बहुत सीमित है 
बच्चों की पढाई बिना विघ्न जारी रह सके इसके लिए छात्रों के लिए नगर बस को हर क्षेत्र से सभी सरकारी स्कूलों के लिए निःशुल्क चलाया जाये। लखनऊ के बाहरी परिक्षेत्र जैसे दुबग्गा , बुद्धेश्वर , मानियांवां , अमौसी जैसे बहुत से क्षेत्र जहाँ कमजोर वर्ग की बड़ी आबादी रहती है में कोई सरकारी इंटरमीडिएट कॉलेज नहीं हैं। तो बच्चों को स्कूलों तक पहुँचने में व्यय न करना पड़े इसके लिए या तो इन क्षत्रों में सरकारी स्कूल खोले जाएँ या यातायात के निःशुल्क साधन उपलब्ध कराएं जाएँ।  इसके अतिरिक्त सरकार मानकों पर  खरे उतरने वाले निजी स्कूलों से अनुबंध करके बच्चों को निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करे। ग्रामीण इलाकों में जहाँ माध्यमिक विद्यालयों की संख्या काफी कम है वहां भी इस तरह के उपाय लागू किये जा सकते हैं।
यद्यपि आठवीं तक के बच्चों की पढाई की सरकारी स्कूलों में शिक्षा निःशुल्क है और उनको किताब तथा ड्रेस भी उपलब्ध है मगर नवी से बारवीं तक न केवल फीस है बल्कि किताबों  तथा शिक्षा सम्बन्धी अन्य खर्च भी है जिसका इन परिस्थितों में वहन करना मुश्किल होगा।  सरकार को कम से कम इस सत्र में बारवीं तक अपने स्कूलों में फीस ,किताबे और ड्रेस फ्री कर देनी चाहिए ताकि पैसों की कमी के कारण किसी बच्चे की पढाई न रुके।  
भौतिक दूरी के साथ स्कूल चलाने के लिए विद्यार्थियों की आधी संख्या के साथ के साथ हर दुसरे दिन कक्षओं को चलाने के सुझाव आ रहे हैं और शेष कक्षाओं की भरपाई घर पर ऑनलाइन कक्षाओं से माध्यम से करने का प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। ऑनलाइन की सुविधा का लाभ उठाने के लिए स्मार्टफोन या कंप्यूटर की जरूरत है।  गरीब परिवार के बच्चों कैसे इन सुविधाओं का लाभ ले सकेंगे?  केरल सरकार इन बच्चों को तीन से साढ़े तीन हजार रूपये के स्मार्टफोन देने की योजना पर काम कर रही है।  देश के दुसरे राज्यों को भी ऐसी योजना बनानी चाहिए। साइबर कैफे में विद्यार्थियों के लिए फ्री पास जैसी व्यवस्था भी का उपाय किया जा सकता है जहाँ वे ऑनलाइन कक्षाएं कर सकें।एक पूर्णतः स्कूली शिक्षा  को समर्पित टीवी चैनल प्रारम्भ किया जा सकता है यद्यपि यह एक विद्यार्थियों से संवाद करने का माध्यम नहीं है पर विषय ज्ञान को सुलभ तो बना ही देता है। सरकार को हर ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे लाखों परिवारों के बच्चों को शिक्षा से वंचित न रहना पड़े।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सरकारी स्कूल के बच्चे ही नहीं , स्कूल भी संसाधन विहीन हैं और भौतिक दूरी का पालन करते हुए कैसे वे शिक्षा व्यवस्था को प्रभावी रख सकेंगे यह चुनौती बनी रहेगी। नयी स्थितियों में नयी तकनीको और प्रशिक्षण की जरूरत होगी। इसके लिए सरकार को ज्यादा निवेश की जरूरत होगी। यह निर्भर करता है कि सरकार की शिक्षा को लेकर क्या प्राथमिकता है।