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कोरोना महामारी के सकारात्मक पहलू
April 18, 2020 •  ब्यूरो चीफ वाराणसी अमित मिश्रा • International

इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना महामारी सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है। COVID-19 जो Corona Virus Deases 2019 का संक्षेप है जिसे WHO ने Epidemic या महामारी घोषित कर चुका है। इंसानों से इंसानों में फैलने वाला यह संक्रामक रोग विश्व के 204 देशों को अपनी चपेट में ले चुका है। इस वैश्विक महामारी के कारण विश्व भर में एक लाख से ज्यादा लोग काल के गाल में समा चुके हैं जबकि संक्रमितों की संख्या 10 लाख के पार जा चुकी है। इस बीमारी की भयावहता किसी से छिपी नहीं है किंतु इसके रोकथाम के लिए अपनाए गए तरीकों में एक बहुत विशाल और सकारात्मक पहलू छिपा है जिसने मानव जीवन से जुड़े अनेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है। उन्हीं बहु आयामी सकारात्मक पहलुओं का सार्थक विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अमित मिश्रा.

इस महामारी के कारण अनेक देशों में Lockdown या तालाबंदी को अपनाया गया। तालाबंदी के कारण सामाजिक और स्थानीय गतिशीलता Social and Spatial Movement में भारी कमी आई। बड़े पैमाने पर लोग घरों में कैद हो कर रह गए। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही भी बेहद कम हो गई। उद्योग धंधे कल कारखाने सभी बंद हो गए। ऐसे में मानव जनित प्रदूषण का स्तर बेहद कम हो गया नदिया स्वछ होने लगी वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण में जबरदस्त कमी आ गई। यह बिल्कुल अप्रत्याशित था जिस पर्यावरण सुधार के कार्य को मनुष्य लाखों प्रयासों के बावजूद नहीं कर पाया उसको एक झटके में इस महामारी में करा दिया।  चाहे स्वच्छ गंगा अभियान हो या odd and even का प्रयोग हो अथवा वाहनों के लिए प्रदूषण मानकों की योजनाएं। किसी से भी इस स्तर की सफलता नहीं मिली जिसे महामारी के परिणाम स्वरूप लॉक डाउन ने हमें मुफ्त में दे दिया।

 इस भयावहता के पीछे छिपी हुई सकारात्मकता का दूसरा पहलू है- ज्यादा समतामूलक समाज। आज सब की आवश्यकता लगभग एक समान है। रोटी कपड़ा मकान और दवाई। बाजार और कामकाज बंद होने के कारण निजी वस्तुओं के उपभोग की प्रतिस्पर्धा में भारी गिरावट आई है। अस्थाई रूप से ही सही लेकिन आज समाज में कोई बड़ा छोटा नहीं रह गया है। सबका उपभोग स्तर लगभग एक समान है। जो सक्षम हैं वह स्वयं कर ले रहे हैं, जो सक्षम नहीं है उनके लिए सरकार और स्वयंसेवी संगठन या समाजसेवी आगे आकर मदद कर  रहे हैं। लेकिन इन जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति सभी लोगों के लिए लगभग समान रूप से हो रही है। यही साम्यवाद और समाजवाद के उदात्त आदर्श थे, जिसे इस तालाबंदी ने पूरा किया है। दूसरे शब्दों में बाजार बंदी के कारण पूंजीवादी प्रवृत्तियां नदारद हैं, और समाजवादी अभिवृत्तियां अपने चरम पर हैं, जो एक ज्यादा समतामूलक समाज के रूप में परिलक्षित होती हैं।

    तीसरा सकारात्मक पहलू है पूर्ण नशाबंदी। एहतियाती उपाय के तौर पर नशे की वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया। साथ ही रुपए पैसे की कमी के कारण  पूर्ण नशाबंदी अमल में आ गया है। अभी तक जो नशाबंदी के सुधार किए भी गए वह इतने व्यापक  स्तर पर सार्थक नहीं हो पाए। नशा एक सामाजिक बुराई है जो न सिर्फ आर्थिक और शारीरिक रूप से क्षति पहुंचाता  है अपितु यह युवाओं को पथ भ्रमित करके अपराध के रास्ते पर ले जाता है। यह गंभीर बीमारियों का कारण भी बनता है।

इसका चौथा सकारात्मक पहलू है आयुर्वेद और नेचुरोपैथी को बढ़ावा मिलना। COVID-19 की कोई कारगर दवा नहीं है। इसकी एक ही दवा है बचाव या रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना। ऐसे में अंग्रेजी या लाक्षणिक चिकित्सा मैं लोगों का विश्वास कम हुआ है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए एक तरफ जहां आयुर्वेदिक औषधियों का इस्तेमाल हो रहा है वही दूसरी तरफ योग और व्यायाम को बढ़ावा मिल रहा है। यह बहुत शुभ संकेत है। चिर प्राचीन भारतीय ऋषियों एवं मनीषियों की चिकित्सा पद्धति को अपनाकर लोग हर तरह के रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ा सकते हैं।  प्रसिद्ध उक्ति है- "prevention is better than cure" (उपचार से बचाव अच्छा)। यह बहुत ही सस्ता, टिकाऊ, घरेलू और सर्वत्र उपलब्ध है। आयुर्वेद और नेचुरोपैथी की ओर यह रुझान आरोग्य जगत में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
[18/04, 01:13] Amit Mishra Vnrs: पांचवा सकारात्मक पहलू है पलायन पर अंकुश। इस महामारी ने पलायन पर पर्याप्त अंकुश लगाया है। जहां एक ओर विदेशों में  फंसे हुए लोग स्वदेश आने के लिए छटपटा रहे हैं वही अपने देश में दूसरे राज्यों में फंसे लोग घर जाना चाहते हैं। अच्छे अवसरों की तलाश में मृगतृष्णा के शिकार यह लोग दूसरे राज्यों एवं दूसरे देशों में पलायन कर गए थे। इनके पलायन से दो तरह की समस्याएं आई थी- विदेशों में जाने वाली प्रतिभाओं के कारण जहां ब्रेन ड्रेन हुआ था वही दूसरे राज्यों में जाने के कारण क्षेत्रवाद की समस्या उत्पन्न हुई थी। इस महामारी के कारण उत्पन्न स्थितियों ने इनको यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अच्छे अवसरों के लिए पलायन करना उचित नहीं है।

यूरोप और अमेरिका की स्थितियों से सहमे लोग अपने देश भारत को सुरक्षित जगह समझने के लिए मजबूर हुए हैं। वहीं दूसरी ओर दिल्ली और महाराष्ट्र में हजारों की संख्या में मजदूर धक्का खाकर, जान जोखिम में डालकर और साधन के अभाव में पैदल ही घर जाने को मजबूर हुए। ऐसे में इनको पलायन के विरुद्ध अच्छा सबक मिला है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अवसरों की तलाश में पलायन करना मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ भी नहीं है। प्रतिभा को हर  जगह रोजगार के अवसर उपलब्ध है।

छठा सकारात्मक पहलू है भौतिकता के द्वंद्व से निकलकर आध्यात्मिकता की तरफ दृष्टि।   पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बाजारवाद, उपभोगवाद, गला काट प्रतिस्पर्धा, निजी वस्तुओं का उपभोग की प्रतिद्वंद्विता के चलते व्यक्ति को तनाव और हाइपरटेंशन के अलावा और कुछ हासिल नहीं हुआ। झूठी प्रतिस्पर्धा में व्यक्ति अपनी सुख शांति को खो दिया। लोगों ने धन जुटाने में, धनवान बनने में, वस्तुएं जुटाने में दिन-रात एक कर  दिया जिसके कारण पहले वो समाज से कटे फिर परिवार से और बाद में स्वयं से दूर होते गए जिसे  निर्वैयक्तिक  विलग्नता ALIENATION कहा जाता है, के शिकार हो गए। लॉकडाउन ने वस्तुओं की होड़ खत्म कर दी। लोग परिवार के साथ रहने को मजबूर हो गए। लोग एक दूसरे की मदद के लिए समाज से भी जुड़े। खाली समय में आत्म चिंतन के लिए पर्याप्त समय मिला। ऐसे में व्यक्ति को भौतिकता से दूर एक वातावरण मिला जिसमें वह निसंदेह अध्यात्म की ओर रुचि लेगा। भौतिकता के इन्हीं विकारों से बचने के लिए भारतीय संस्कृति में कहा गया है- साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए।

 सातवां सकारात्मक पहलू है- विश्व जगत का भारतीय संस्कृति की ओर रुझान। जैसा कि अमेरिका और इजरायल के राष्ट्रपति ने कहा कि कोरोना से बचने के  लिए हाथ मिलाने की बजाय भारतीय संस्कृति में प्रचलित नमस्ते का प्रयोग करें। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए भी पूरा विश्व प्राचीन भारतीय पद्धतियों को अपना रहा है- योग, ध्यान, आयुर्वेद आदि के विश्वव्यापी प्रसार को बढ़ावा मिला है। दाह संस्कार को भी विश्व स्तर पर मान्यता मिली है।

 आठवां सकारात्मक पहलू है- विश्व समुदाय में भारत का बढ़ता हुआ दबदबा। भारत कोरोना में एकमात्र लाभकारी दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का प्रचुर मात्रा में उत्पादन करता है। ब्राजील ने तो इसे संजीवनी बूटी का नाम दे दिया। अमेरिका समेत विश्व के तमाम देश भारत से इस दवा को पाने के लिए लालायित हैं। जिसके कारण विश्व में भारत का दबदबा बढ़ा है। दूसरे यह कि भारत की रणनीति कोरोना को रोकने में अपेक्षाकृत अधिक कारगर साबित हुई है जिसकी प्रशंसा W H O सहित तमाम देश कर  रहे हैं।

नवा सकारात्मक पहलू है- घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिलना। ऐसे में जब आयात और निर्यात बुरी तरह से प्रभावित हैं, लोगों का घरेलू उत्पादों में दिलचस्पी बढ़ी है। लोग ऐसा करने के लिए प्रेरित भी हो रहे है। दूसरा एक बड़ा कारण यह भी है कि चीन से फैले इस महामारी ने चीन के प्रति घृणा का भाव भर दिया है। जिससे आम लोगों में चीनी उत्पादों के  बहिष्कार की भावना घर कर गई है। बढ़ी हुई बेरोजगारी भी घरेलू उद्योगों के विकास में सहायक होगी।

दशवें सकारात्मक पहलू में हम कई छोटे-छोटे बिंदुओं को ले सकते है-
# देश और समाज के प्रति   संबद्धता या लगाव का बढ़ना # राष्ट्रवाद की भावना का बढ़ना 
# सामाजिकता या सामूहिकता की भावना का बढ़ना
# अपराध में भारी कमी 
# भ्रष्टाचार में कमी 
# राष्ट्र की एकता को बढ़ावा आदि।

लेकिन विडंबना यह है कि यह सभी सकारात्मक पहलू अस्थाई हैं। लॉकडाउन के समाप्त होते ही सारी व्यवस्था पूर्ववत् हो जाएगी। ऐसे में यह भारतीय जनमानस के ऊपर निर्भर करता है कि वह इस आपदा से कितनी सीख लेता है। आपदा ने एक सकारात्मक मार्ग तो दिखा दिया है, लेकिन उस पर चलना लोगों के ऊपर निर्भर करता है।