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अधूरा हमसफर ........
September 13, 2020 • अफजल हुसैन
" तबरेज़ तू गड्ढा खोद जल्दी ..आज इस हिजड़े को मारके गाड़ देंगे ..जहाँ तहां इस खुदा के लानत की वजह से गर्दन झुकानी पड़ती है... शर्मिंदा होना पड़ता है .. न ये बदनुमा दाग रहेगा न रोज़ रोज़ जलालत होगी " अब्बू ने बाएं हाँथ से मेरी गर्दन को पकड़ा हुआ था और दाएं हाँथ से मेरे मुंह पर पूरी हैवानियत से थप्पड़ घूंसा बरसाए जा रहे थे,
 
"अब्बू छोड़ दीजिये मुझे ...अम्मी ..अम्मी ..प्लीज अब्बू " मैं अपने छोटे छोटे कमज़ोर हांथो से दर्द के मारे दहाड़ दहाड़ के रोते हुए अब्बू की पकड़ से खुद को छुड़ाने की नामुमकिन कोशिश कर रही थी और मेरी आँखें जो नीली स्याह होकर सूजने लगी थी आंसुओं का बाँध तोड़ते हुए दया की भीख मांग रही थी , वो इतनी ताक़त से मुझपे हमला कर रहे थे की मुंह पे लगने वाले हर घूंसे पर आँखों के सामने सितारे चमकने लगते थे,
 
" तबरेज़ फेंक कुदाली.." अम्मी हड़बड़ाती हुई आँगन में भाग के आयीं मेरी चीख सुनके और तबरेज़ भाईजान के हाँथ से कुदाली छीनकर एक तरफ फेंक दी .. "हाए अल्लाह भाई के लिए क़बर खोद रहा है जल्लाद.. कयामत के दिन क्या मुंह दिखाएगा अल्लाह को ".. भर्राई आवाज़ में इतना कहते हुए झन्नाटेदार तमाचा लगाई भाईजान के गाल पर.. फिर अब्बू की तरफ भागी मुझे बचाने.. "जिन्नात सवार हो गया है तुम बाप बेटों के सर पर.. लिल्लाह खुदा का कोई खौफ नहीं....मार डालेंगे  क्या मेरे लाल को.. आपको खुदा का उसके रसूल का वास्ता छोड़िये गुल को " मुझे छुड़ाने की कोशिश को नाकाम होता देख अब्बू के हाँथ पर पूरी ताक़त से दांत काटा अम्मी ने क्यूंकि वो दोनों हांथो से मुझे मारने के लिए मेरा गला दबाये हुए थे और मैं हलाल मुर्गी की तरह छटपटाए जा रही थी ,
 
अम्मी के दाँत गड़ते ही अब्बू ने मेरी गर्दन छोड़ी और अम्मी के बालों को मुट्ठी में जकड़ते हुए चिल्लाए "तू पीछे हो जा सा... ननन..नहीं तो आज इस हिजड़े के साथ तुझे भी काट के गाड़ दूंगा ..तूने अपने कोख से जना है न इस बददुआ को .. इस मनहूस को जन्नते हुए मर जाते तुम दोनों तो आज इतना जलील न होना पड़ता " इतना बोलते हुए अब्ब्बू ने अम्मी को जोर से थप्पड़ मारा और ज़मीन पर धक्का दे दिया..
 
अम्मी खुद को संभालते हुए बिजली की फुर्ती से उठी .. मेरा हाँथ पकड़ा और लड़खड़ाते हुए घर से बाहर भागी ..बाहर से गेट की कुण्डी लगाई.. मेरे माथे को चूमा.. आँचल में बंधा दस का नोट मेरे हाँथ में रखा और मुझे धक्का देते हुए बोली " बेटा भाग जा दुर कहीं ..ये कसाई तुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे ..."
 
"मैं लड़खड़ाती हुई भागी जा रही थी कुछ देर दरवाजे पर लात घूंसों की आवाज़ आई उसके बाद बस अब्बू की गालियां और अम्मी की गिड़गिड़ाहट मेरे कानो में गूंजती रही .. घंटों तक दौड़ते दौड़ते कब गुवाहाटी जंक्शन पहुँच गयी पता ही नहीं चला.. जो ट्रैन चलती हुई दिखी उस में चढ़ गयी और कांपते  हाँफते फर्श पर ही पसर गयी.."
 
इतना बताते हुए गुलाफ्शां रोने लगी ..मेरे केबिन में सन्नाटा पसरा हुआ था ..सभी सहयात्री गुलाफ्शां की दर्दनाक दास्ताँ सुनके भावुक हुए पड़े थे.
 
गुलाफ्शां से मेरी मुलाक़ात इत्तेफाकन थी , मैं गुवाहाटी से दिल्ली आने के लिए ट्रैन में चढ़ा तो देखा मेरे सामने वाले बर्थ पर अर्धनारीश्वर जनाना स्वांग किये एक किन्नर बैठा था या बैठी थी ,उसने कई बार बात शुरू करने की कोशिश की मगर मैं अनदेखा करता रहा क्यूंकि जब भी वो मुझे कुछ बोलती बाकि यात्री चुभती हुई मखौल भरी नज़र से मेरी तरफ घूरने लगते ,
आखिरकार उसने मुझसे पूछ ही लिया " आप सभ्य लोग हमसे इतना दूर क्यों भागते हैं  ?.. हम भी इंसान हैं .. उसी खुदा ने हमें बनाया है जिसने आपको .. बस एक अंग के कमी की इतनी बड़ी सजा देते हो के जिस सीट पर हम बैठ जाते हैं उस पर दूसरी औरतें नहीं बैठती.. औरतें छोडो आदमी नहीं बैठते..  बस में या तो हमको मसलते हुए मर्द निकलते हैं या फिर खुद को इस तरह बचा के निकलते हैं के अगर छू दिया तो वो भी किन्नर बन जाएंगे.. कोई तमीज से प्यार से हमसे दो बात नहीं करता यहाँ तक की कोई कमरा किराए पर नहीं देता हमें.. क्या हम इतने अछूत हैं, क्या गूंगे बहरे लंगड़े सबके साथ ऐसा ही करते हो तुम लोग जैसा हमारे साथ होता है.. कभी जानने की कोशिस की है हमारी ज़िन्दगी हमारा दुःख दर्द हमारी परेशानी,"
 
" नहीं नहीं नहीं.. ऐसी कोई बात नहीं है ..आप जज़्बाती मत होइए" मैंने किसी तरह उसे चुप कराया ..
"चलिए.. एक बात पूछूं बुरा न मानो तो " मैं औचारिक रूप से मुस्कुराते हुए उससे बात चीत करनी शुरू की,
 
" हाँ पूछिए न वैसे भी हमारे बुरा भला मानने से किसी को क्या फर्क पड़ता है "..उसने तुनकते हुए कहा , 
 
"तुम लोग आम लोगों की तरह मेह्नत मज़दूरी क्यों नहीं करते ? ..पढ़ लिख के नौकरी करो ..क्यों ऐसे ट्रैन में, रेड लाइट पे भीख मांगते हो ? .. देहव्यापार करते हो .. और कई बार तो पैसा मांगने के चक्कर में इतना तंग कर देते हो के आदमी चिढ़ जाता है " चेहरे पर गंभीरता लाकर अपने बड़बोले  होने का प्रमाण देते हुए मैंने ये सवाल पूछ ही लिया,
 
उसने किसी दार्शनिक के अंदाज़ में जवाब की शुरुआत की "इज़्ज़त की ज़िन्दगी कौन नहीं जीना चाहता जनाब... पुल पर बैठ के उफनती नदी में तैराकी की सलाह देना आसान है .. लेकिन जो  तैराक बहाव  में फंसता है वही जानता है मुश्किल हालात कैसे डूबा देते हैं "
 
"मतलब ....मैं समझा नहीं"
 
"सब समझाती हूं साहब"..उसने मुस्कुराते हुए मेरे बाएं जांघ को दो बार थपथपाया और बताने लगी.. 
" मेरा नाम गुलाफ्शां है.. बचपन में माँ ने गुलशिखर रखा था ..तीनो भाई बहनो में सबसे छोटी थी मगर पढाई में सबसे होशियार .. यहीं गुवाहाटी के बगल में गाँव है मेरा चंगसारी..  अब्बू की मोटर मैकेनिक की दूकान थी.. मैं भी पढ़ के इंजीनियर बनना चाहती  थी.. जबसे होश संभाली स्कूल में पड़ोस में लोगों को हिजड़ा खुसरो छक्का गुड़ मीठा आदि कहके मुझपे हँसते हुए देखी.. "मैं हमेशा अपनी अम्मी से इन शब्दों का मतलब पूछती थी .. मगर वो मुस्कुराकर मेरे माथे को चूमती और कहती मेरा बेटा सबसे सुन्दर और समझदार है न इसलिए सब चिढ़ते हैं उससे ..बस एक वही थी जो मुझे प्यार करती थी ..वरना अब्बू ने तो पैदा होते ही मुझे मार डालने की कोशिस की थी लेकिन अम्मी के ज़िद ने मुझे ज़िन्दगी दे दी मगर फिर भी मुझे थप्पड़ मारे बिना किसी भी रात न अब्बू को नींद आती थी न बड़े भाई को .. मैं दस साल की थी मेरा स्कूल छुड़वा दिया और मुझे घर में नज़रबंद कर दिया  क्यूंकि मेरे चलने का ढंग बदल रहा था...और यकीन मानिये खुदा कसम ये खुद हो रहा था ..एक दिन सब शादी में गए थे खुदा जाने वहां क्या हुआ वहां से गुस्से में भाई और अब्बू लौटे और....."
 
" ट्रैन में चढ़ने के बाद क्या हुआ गुलाफ्शां ?" उसके बगल में बैठ के कंधे पे उसका सर टिका  के उसके आंसू पोछते हुए उसके रोने से पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए मैंने उसकी ज़िन्दगी के बारे में और ज्यादा जानना चाहा..
 
मेरा स्नेह पाके उसने दो गहरी सांसे ली और आगे की बात बतानी शुरू की "जब मुझे होश आया तो दो पुलिस वाले मुंह पे पानी के छींटे मार रहे थे "
"किसने मारा तुम्हे ..कहाँ से आये हो ..कहाँ जाना है ..माँ बाप कौन है तुम्हारे "
 
"मैं अपना पुनर्जन्म देख रही थी.. मैं वापस मौत के मुंह में नहीं लौटना चाहती थी तो खामोश रही ..मेरा मेडिकल कराया गया मेरी असलियत उन्हें पता चली तो मुझे ज्योति दीदी के हवाले कर दिया ,
 
वो भी किन्नर थी और मेरी पहली गुरु.. उन्होंने पांच साल मुझे अपने पास रखा, मुझे नाचना गाना सिखाया... किन्नर समाज के तौर तरीके बताए.. बदले में वो मुझसे घर के काम कराती थी ,उनका रसूख ऊँचा था सरकारी लोगों से जानपहचान थी इसलिए रहन सेहेन भी ठीक था.. जब मैं पंद्रह की हुई तो किन्नर समाज में प्रवेश के लिए बहुचारा माता की पूजा रखी गयी..बहुचारा माता हम किन्नरों की देवी हैं.. दक्षिण भारत में इन्हे रेणुका माता कहते हैं.. उनके सामने हमें "निर्वाण" नामक प्रकिर्या से गुजरना होता है जिसमे हल्दी से स्नान करके दुल्हन के रूप में तैयार होके हमें पुरुषार्थ की अंतिम निशानियों को समाप्त करने के लिए उस दर्द से गुजरना पड़ता है जिसकी कल्पना से भी आपकी रुह काँप उठेगी ..उसके बाद हमारी बोली लगती है जो सुंदरता और कद काठी के आधार पर होती है, सबसे ऊँची बोली लगाने वाले गुरु की शिष्य बनके हमें जाना पड़ता है और उसके बाद उसके हर आदेश को मानना होता है फिर चाहे वो कहीं नाचना हो ,ट्रैन दूकान सड़क या रेडलाईट पर भीख मांगनी हो या फिर देह व्यापार ही क्यों न करना हो , ..उस  गुरु द्वारा निर्धारित रकम हर दिन या हर महीने उसको देना पड़ता है कुछ भी करके... नहीं तो बदले में पिटाई भी होती है.. , हम एक गुरु से दूसरे गुरु किसी वस्तु की तरह कई कई बार बिकते हैं ..कोई कोई गुरु अच्छा होता है तो कोई बहुत बेकार  ,.. 
 
ऐश्वर्या दीदी मेरी नयी गुरु थी उन्होंने तीन लाख में खरीदा मुझे ज्योति दीदी से .. उसने एक नयी दुनिया से मेरा ताल्लुक कराया ..ये दुनिया मेरे जैसे अभागे लोगों की थी.. छोटे छोटे अँधेरे कमरे.. सालों से गन्दा पड़ा बदबूदार टॉयलेट.. लिपस्टिक पाउडर की सर चढ़ने वाली महक ..क्रीम की परत में छुपा मरदाना चेहरा ..औरतों के रूप का स्वांग रचके अपने दुःख अकेलेपन और तिरस्कार को भूल कर सबका मन बहलाने वाली कला... कटोरी भर खाने के बदले  सुबह घरों में नाचना शाम में रेड लाइट पे भीख मांगना और रात में जिस्म बेचने वाली दिनचर्या से पहली बार रूबरू हुई.. शुरू शुरु में मैं ये सब करने से मना करती थी ..खूब पिटाई होती थी डंडे से कोड़े से तो धीरे धीरे डर के मारे उस माहौल और उस ज़िन्दगी को अपनाती चली गयी ..वहां से भाग भी तो नहीं सकती थी ..आखिर कहाँ जाती ?," उसने भंवे उचका कर मुझसे वो सवाल किया जिसका जवाब केवल मेरा उदासीन चेहरा था ,
 
फिर मुस्कराहट चेहरे पे लाते हुए उसने माहोल बदला और चंचलता भरे अंदाज़ में आगे बताना शुरू किया.. "पता है हम ज़ोर की ताली क्यों बजाते हैं ?... ये एक इशारा होता है अपनी दूसरी किन्नर बहनों के लिए की हम तेरे साथ खड़ी हैं अगर कुछ गलत हुआ तो.. और पता है हमारे व्यवहार में इतनी बेबाकी और बेशर्मी  जिससे आप लोग इर्रिटेट होते हो आत्मरक्षा के लिए होता है क्यूंकि अगर हमने अपने व्यवहार में सादगी रखी तो आपके समाज के भेड़िये हमें मुफ्त में नोच खाएंगे क्यूंकि हमारे पास हमारी रक्षा करने के लिए न बाप है न भाई और न कोई दोस्त ,.. हमसे तो कोई दोस्ती भी बस हमारे अधूरे जिस्म के लालच में करता है ..आप बताइये आपका कोई किन्नर फ्रेंड है या आपके किसी दोस्त का ..अगर होगा भी तब भी आप लोगों में इतनी हिम्मत नहीं के आप उसे अपने दूसरे दोस्तों से मिला सको कभी घर बुला सको.. बाकि दोस्तों की तरह उनके साथ घूम फिर सको या गर्व से बोल सको के फलाना किन्नर मेरा दोस्त है , बताइये आपके अंदर हिम्मत है अपने दोस्तों को बताने का की गुलाफ्शां जो एक किन्नर है वो आपकी दोस्त है,.. क्या कभी मैं आपको मदद के लिए बुलाऊंगी आप आओगे अपने घर वालों को बता के की गुलाफ्शां की मदद के लिए जा रहा हूँ,..क्या मुझे कहीं ये कहके इंट्रोड्यूज कर सकते हो के शी इज़ माई फॅमिली ," बोलते बोलते उसके चेहरे भाव एकदम बदल गया था..उसका तेवर गरम हो गया था..उसकी आंखें मुझसे कई सवाल कर रही थीं..
 
मगर मैं खामोश था मेरे पास उसका जवाब नहीं था ,इससे पहले के मैं कुछ बोलता वो बोल पड़ी..
" मुझे लगता है आपके सब सवालों का जवाब मैं आपको दे चुकी और जो नहीं दिया उनका जवाब आपकी खामोशी में छुपा है... जब तक आपसे सम्मान नहीं मिलेगा.. आपके समाज में जगह नहीं मिलेगी.. हमारी स्तिथि और ज़िन्दगी दोनों ऐसी ही रहेगी.."
 
ये बोलके वो चुप हो गयी.. फिर अचानक ज़ोर से अपने किन्नर वाले अंदाज़ में हंसी .. दो बार ताली बजाई मेरे दाहिने बाजू को थपथपाई.. एक गहरी सांस भरके मुंह ऐंठते हुए उसने मेरी तरफ देखा और लम्बी होके लेट गयी.. पूरा केबिन पीठ के बल खामोश पड़ा था मैं कमर टिकाए गुमसुम बैठा था.. सब शांत थे बस खट खट करती पटरियां थीं जो शोर कर रही थीं और निरंतर मुझसे  और सबसे  पूछे जा रही थीं,.." ओ उन पर हंसने वाले क्या उन्हें अपनाने की हिम्मत है तुझमे ???"..