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रामकथा के मिति जग नाही
January 9, 2019 • डॉ त्रिलोकी नाथ सिंह

 रामकथा के मिति जग नाही......

रामचरित मानस के बाल कांड में तुलसी दास लिखते हैं कि रामकथा के मिति जग नाही . अर्थात राम कथा की संसार में कोई सीमा नहीं है . ऐतिहासिक दृष्टि से प्राचीन काल से रामकथा का तो प्रचार है ही. भौगोलिक दृष्टि से भी दुनिया भर में एक हजार से अधिक सहर राम नाम से जुड़े हुए हैं . हॉलैंड में स्थित महर्षि वैदिक विश्व विद्यालय में शोध के दौरान ऐसा हुआ है . ईरान में “रामदोह” “रामसार” आदि तो ईराक में “रामादी” “रामादी बैरेज” जार्डन में ‘राम रामाल्लाह” केनिया में “रामा” और “ राम” नामक सहर है . लीबिया में " रामलहल कबिरह" तो अमेरिका में "रामह रामयो" नामक सहर है . अफगानिस्तान में " रामगुल " तो अलास्का में " रामपार्ट " है . बेल्जियम में " राम सेल " बांग्लादेश में " रामगढ़ " ब्राजील में " रामोज " डेनमार्क में " रामसिंह " रामटेन " तो इंग्लैंड में " राम ", " रामगेट " तो फ्रांस में " सेंट रामबर्ट " जर्मनी में " रामबो ", " रामबर्ग " पुर्तगाल में " रामलाहट " दक्षिणअफ्रीका में " रामे " और " रामस गेट " स्पेन में " रामकस्टहट " नमक सहर है . श्रीलंका में ' रामबेवा ' थाईलैंड में 'रामत' अरब में 'राम्स' तो रूस में 'रामासुख' 'रामेसा'जिम्बाबेमें ''रामाकाडम' सहर है . ये तो कुछ नमूने हैं . लेबनानवासी वैज्ञानिक प्रो. टोनी नारद ने तो यह पुष्ट किया है कि मानव मन में भगवान राम और बुद्ध मौजूद हैं . ऊपर तो सहरों के नाम के कुछ नमूने दिए गए हैं .

राम का स्वरुप : तुलसी के अनुसार राम का स्वरुप बुद्धि, मन और वाणी से अतर्क्य है . उनका स्वरुप, 'ब्रम्हांड निकाया निर्मित माया रोम-रोम प्रति वेद कहैै' ( बा. का. छ. ३ ) और 'व्यापक एक ब्रह‍्मअविनासीसत चेतन धन आनँँदरासी .. अस प्रभु ह्रदय अव्दत अविकारी .सकल जीवन जग दीनदुखारी ..' 

         ' नाम निरुपम नाम जतन ते

           सो प्रगटन, जिमि मोल,रतनते'

भाव यह है उस ब्रह्म की शक्ति से ब्रह्मांडों के समूह निर्मित होते हैं . जड़, चेतन, आनंदमय वह ब्रम्ह पूर्ण रूप से हमारे ह्रदय में मौजूद है, फिर अज्ञान वस हम दुखी हैं . वह राम कल्पवृक्ष के समान है, जो मांगोगे दे देंगे -

राम कथा तरु जोई जोई माँगिहै.

तुलसीदास स्वारथ परमारथ न खाँगिहै .. ( वि. पं. पं॰ ७० )

किन्तु यह हम युक्त मन अद्भुत है . यह घोर कृत्या भी कर सकता है .और यही शांति भी देता है . यह बिजली हीटर और कूलर दोनों चलती है :

    इदं यत् परमेष्ठिनं मनो वांं ब्रह्मसशितमं .

   येनौव ससृजे घोरं तेनैैैव शतििरस्तु नः .. ( अथर्व ०१९.९.४ )

 तुलसी राम कथा ने कितनों को प्रेरणा दी है , इसका आंकलन आसान नहीं है .महात्मा गाँधी अपनी आत्म कथा में लिखते हैं की उनकी उम्र १३ वर्ष की रही होगी तब उन्होंने ने तुलसी रामायण के कथावाचक लाधा महाराज से राम कथा सुनी . राम मेरे मन में बस गए हैं और वही मेरे जीवन को चला रहे हैं . गाँधी सदैव राम जप करते रहते थे . अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा गाँधी जी का चरित्र अपने पास रखते हैं और कहते हैं, यही दुनिया को बचा सकते हैं . अहिंसा के द्वारा इन्होने बड़ा जागरण किया . मार्टिन लूथर किंग-२ ने जान दे दी लेकिन हिंसा का राश्ता नहीं अपनाया . 

 अमरीका ५० विश्वविद्यालयों में गाँधीवाद के अध्ययन के कोर्स लागू किये है .

राम साधना :  स्थूल रूप से मन ९ फैकल्टी है १. इच्छा २. तर्क ३. भावना ४. कल्पना ५. अंतःकरण ६. पंचेद्रियाँ ७. स्मृति ८. छठी इंद्रिय ९. अचेतन . अचेतन लगभग ९० % भाग है शेष चेतन है . अचेतन बहुत शक्तिशाली है .  ( you can work your own miracle- Nepoleon Hills ) मन की गति घड़ी के पेंडुलम की तरह आगे-पीछे चलती रहती है . उसे वर्तमान में रखना एक बड़ी साधना है . ( The Power of now E-Tolle) डॉ डब्लू डब्लू डायर के अनुसार औसत आदमी के मन में २४ घण्टे में ६० हजार विभिन्न विचार आते हैं . (Your Erroneous Zones) मनुष्य के मन में अपार शक्ति है . इसके नियम में केलिफार्निया के ब्रेन इंस्टिट्यूट और हापकिन्स मेडिकल यूनिवर्सिटी में काफी अध्ययन हुआ . भारत में साधना के द्वारा इस पर बड़े व्यवस्थित ढंग से विचार हुआ है . ब्रम्ह भाव में स्थापित हो जाना सर्वोत्तम है . फिर ध्यान, जप , मूर्ति पूजा आदि नीचे की कक्षायों हैं .संत कहते हैं, जप सबके लिए सुलभ है . तभी संत कहते हैं :

 

नाना पथ निर्वाण के नाना विधान बहु भाँती .

तुलसी तू मेरे कहे राम नाम जपु दिन राती ..  तुलसी 

 

कहै कबीर मै कथि गया कथि गया ब्रम्ह महेश .

राम नाम ततसार है सब काहू उपदेस ..कबीर 

     १९ वीं शती के तीन योरोपीय चिंतकों ने बड़ी उथल पुथल मचाई . १. डार्विवन २. कार्लमार्क्स और ३. फ्रायड . इसके पूर्व हे १४५३ ई में लोग घोर धार्मिक युद्धों के विरोध में लग गए थे . आधुनिक युग का मतलब ही था ब्रम्हांड और मनुष्य की खोज .

फ्रायड के विचारों पर पुनर्विचार करने वालों में कर्लजुंग और कार्ल मेनिनजर प्रमुख हैं. ये दोनों मनोचिकित्सक थे . 

डॉ कार्ल जुंग का कथन है कि गत तीस वर्षों से विश्व के सब सभ्य देशों के नागरिकों ने मुझसे उपचार कराया है और मैंने सैकड़ों का उपचार किया है . किन्तु उन रोगियों में से ३५ वर्ष से उपर की अधेड़ अवस्था वाले रोगियों में से एक भी एसा नहीं निकला जिसकी समस्या अन्ततःजीवन के प्रति अध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाने की न रही हो . यदि मै यह कहूँ कि उनमे से प्रत्येक इस लिए बीमार पड़ा कि उसने उस अध्यात्मिक दृष्टिकोण को खो दिया था, जिसे विभिन्न धर्म युगों-युगों से अपने अनुयायियों को देते आये हैं तो अत्युक्ति न होगी . उन रोगियों में जो भी  अध्यात्मिक दृष्टिकोण नहीं अपना सका वह उपचार करने पर भी स्वस्थ नही हो सका .

विलियम जेम्स ने भी लगभग यही बात कही है, उनका कहना है कि " धर्म उन शक्तियों में से है जिसके सहारे मनुष्य जीता है, उस शक्ति के नितान्त आभाव का अर्थ है मृत्यु . " 

कर्लमेनिनजर अमरीकी मनोरोग चिकित्सक सोसाइटी के चेयरमैैन भी थे, उनके अनुसार जीने के साथ मरने की इक्षा साथ रहती है " Main Again" पुस्तक में उन्होंने इसे विस्तार से बतलाया है . रामचरित मानस में मारीच इसका सही उदाहरण है राम के पास जाने पर उसके शरणागत भी हो सकता था विभीषण की तरह किन्तु उसने स्वर्ग के सुख की या मुक्ति का राश्ता चुना . राम सीता की फिक्र उसने नहीं की . यह मनोरोग है . शायद रावण में या उसके सम्बंधियं में यह रोग खानदानी था . रावण इसी लिए युद्ध करता रहा और मारा गया . वर्तमान समय के धार्मिक युद्धों पर इस दृष्टि से विचार होना चाहिए. 

क्षेपकों से हानि : आजकल न्यूक्लियर हथियार से युक्त मिसाइल से दुनिया को बड़ा भारी खतरा है किन्तु शास्त्रों के क्षेपक समाज को काफी हानि पंहुचा सकते हैं . इन ग्रंथों पे अनुसन्धान कर के पुनर्सम्पदन तात्कालिक आवशकता है . लखनऊ के ' राष्ट्र धर्म ' मासिक पत्र ने अक्टूबर २०११ के अंक में इस विषय पे बड़ा खोजपूर्ण लेख छापा था . जिसके लेखक विश्व मोहन तिवारी ने सप्रमाण सिद्ध किया है कि रामायण और महाभारत में ऐसे हानिकारक क्षेपक बहुत हैं . रामायण में सीता का निष्कासन और शम्बूक का वध ऐसे ही बाद की कल्पित कथाएं हैं. 

फिर भी तुलसी के साहित्य ने भारत का असीम कल्याण किया है ..

 

डॉ त्रिलोकी नाथ सिंह 

पूर्व रीडर हिंदी विभाग ल. वि. वि.

पूर्व एसो. प्रो. हिंदी भारतीय सांस्कृतिक केंद्र 

सूरीनाम, दक्षिणी अमरीका