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माॅब लीचिंग या राजनीति
July 26, 2019 • दिलीप कुमार मिश्र पत्रकार श्रावस्ती

 

उपद्रवी हिंसक भीड़ बनाम माब लीचिंग

उपद्रवी हिंसक भीड़ बनाम माब लीचिंग की पुरानी परम्परा और कुछ घटनाओं पर राजनीति प्रेरित बुद्धिजीवियों की चिंता पर विशेष- 

भीड़ तो भीड़ होती है और वह जिसे चाहे उसे पीट कर मार डाल सकती है और भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डालने की परंपरा आज से नहीं बल्कि एक लंबे अरसे से रही है। हम अपने देश की बात करते हैं तो यहां पर भी आजादी के बाद से ही उत्तेजित या सुनियोजित भीड़ द्वारा पीटकर मार डालने घटनाएं होती रही है लेकिन कभी इन घटनाओं को माब  लिंचिंग बताकर हो हल्ला नहीं किया गया जितना हो हल्ला इधर कुछ वर्षों से हो रहा है। इस समय जैसे  माब लिंचिंग की घटनाओं की जैसे बाढ़ सी आ गई है और प्रायः कहीं ना कहीं की घटनाएं मीडिया की सुर्खियों में बनी रहने लगी हैं। इधर जय श्री राम और गाय के नाम पर भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं को माब लिंचिंग बताकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।इतना ही नहीं करीब 50 उदारवादी बुद्धजीवी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस पर चिंता व्यक्त की गई।इस तरह की चिठ्ठियां पहली बार नहीं बल्कि इसके पहले भी लिखी जा चुकी है तथा लोकसभा चुनाव के दौरान असहिष्णुता बढ़ने का आरोप लगाते हुए भाजपा को वोट न देने का आवाह्वन करते हुए पुरस्कार भी लौटाये जा जा चुके हैं।प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वाले तथाकथित उदारवादी बुद्धजीवी उस समय मौन थे जिस समय जम्मू कश्मीर में  वहां के ब्राह्मणों के साथ मॉब लिंचिंग करके भगा दिया गया जो आज इधर-उधर भटक रहे हैं।इतना ही नहीं भीड़ द्वारा ही वहां पर हमारे सेना के जवानों के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है वह भी माफ लिंचिंग का ही परिणाम है। दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिखों पर हमले माब लीचिंग के रूप में ही हुए थे और दिल्ली केरल पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश बिहार छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में माब लिंचिंग की घटनाएं आज से नहीं एक लंबे अरसे से हो रही हैं और आज भी जारी हैं।पश्चिमी बंगाल तो माब लीचिंग का बेताज बादशाह बना हुआ है और वहाँ पर आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद से भी माब लीचिंग का बोलबाला है। नक्सलियों की भीड़ द्वारा किया जा रहा नरसंहार माब लिंचिंग ही है और भीड़ जिसे चाहती है उसे सामूहिक हिंसा का शिकार बना देती है। अभी चुनाव के दौरान देश के गृहमंत्री अमित शाह के साथ जो घटना हुई उसे ही माब लिंचिंग का प्रतिफल माना जाएगा। भीड़ ने जय श्री राम कहने वालों या गाय के नाम पर ही किसी व्यक्ति को पीट- पीटकर नहीं मार डाला है बल्कि चोरों एवं डाकुओं  के नाम पर भी  द्वारा तमाम लोगों को अब तक मारा जा चुका है।इधर माब लीचिंग राजनैतिक हथकंडा बन गया है और जय श्रीराम को इसका आधार बना दिया गया है।अभी दो दिन पहले वहाँ पर चल रही वर्तमान राजनीति के तहत एक शिक्षक छात्राओं एवं एक सासंद की पिटाई भीड़ द्वारा कर दी गई। यह सही है कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है और किसी को सजा देना भीड़ का नहीं बल्कि कानून का काम होता है। इसके बावजूद भीड़ द्वारा कानून को बलाए ताख रखकर खुद फैसला करना उचित नहीं है क्योंकि हमारा देश संविधान से बना हुआ है जिसमें जो जैसा करता है उसको कानून के तहत ऐसी सजा अदालती प्रक्रिया के साथ  दी जाती है। लोकतांत्रिक देश में जाति धर्म मजहब एवं राजनीति की ओट में  किसी को मार डालना तथा चोरी डकैती जैसे जघन्य अपराध के आरोप में कानून की जगह अपने आप खुद सजा देना कतई उचित नहीं कहा जायेगा।क्योंकि प्रायः ऐसी घटनाओं में तमाम घटनाएं संदेह के आधार पर होती हैं इसलिए किसी व्यक्ति को चोर डकैत बता कर मार डालना गलत है और माब लिंचिंग की श्रेणी में आता है लेकिन मुठभेड़ में मारा जाना मां लीचिंग की श्रेणी में नहीं आता है। भीड़ द्वारा हो रही हिंसा की घटनाएं निंदनीय है और ऐसी  घटनाओं में शामिल लोगों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए ताकि वह भविष्य में ऐसी हिम्मत ना कर सके। एक व्यक्ति को अनेक लोगों द्वारा पीट-पीटकर मारना कतई उचित नहीं है लेकिन सिर्फ घटना विशेष को लेकर हो हल्ला मचाना प्रधानमंत्री को पत्र लिखना पुरस्कार वापस लौटाना भी उचित नहीं है क्योंकि माब लीचिंग माब लीचिंग होती है वह चाहे जम्मू कश्मीर में हो या बंगाल बिहार में या छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश आदि में हो। हालांकि  सरकार बार-बार माब लिंचिंग की  घटनाओं की निंदा कर रही है इसके बावजूद विपक्षी दल एवं तथाकथित बुद्धिजीवी सरकार को कटघरे में खड़ा करने पर आमादा हैं। सरकार का दायित्व बनता है कि वह इस अराजकता फैलाने जैसी माब लीचिंग की घटनाओं को कड़ाई के साथ  पेश आए और भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को पीट- पीटकर मार डालने की बढ़ती परंपरा को समाप्त करने की दिशा में कार्य करें।  इस समय जो लोग माब लिंचिंग प्रचार अभियान चला रहे हैं उन्हें निष्पक्ष भाव से लगातार होने वाली अन्य भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा की घटनाओं को अगर इसी तरह उठाया गया होता तो शायद आज देश को जम्मू कश्मीर के साथ नक्सल एवं हिंसा प्रभावित राज्यों में माब लीचिंग का मुकाबला न करना पड़ता और माब लीचिंग की घटनाएं अब तक कब की  बंद हो गई होती। 
 दिलीप कुमार मिश्रा
  श्रावस्ती