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बिजली चोरी आखिर होती कैसे
July 24, 2019 •        शैलेन्द्र सिंह

बिजली विभाग और सरकारी लूट

कभी कनेक्सन काट कर, कभी कनेक्सन काटने के दौरान, कभी बिजली चोरी पकड़ने का अभियान चला कर बिजली विभाग आये दिन अखबारों की सुर्खियाँ बटोरता रहता है। आये दिन अखबार में बिजली चोरी लाइन लोस और बिजली विभाग के घाटे की खबर छपती रहती है और विभाग का नाटकीय घटनाक्रम चलता रहता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है की बिजली चोरी आखिर होती कैसे है और विभाग घाटे में क्यों है? वास्तिवकता सामने आती है की बिजली चोरी विभाग की मिली भगत से हे होती है, विभाग के ही कर्मचारी बिजली की चोरी करते हैं। ठेकेदारों और संविदा कर्मियों के कंधे पर चल रहा बिजली विभाग भ्रष्टतम विभागों में से एक है। नीचे से लेकर ऊपर तक विभाग के लगभग सभी कर्मचारी, अधिकारी पूरी तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। यही कारण है कि दिन प्रति दिन विभाग कंगाल और विभाग में काम करने वाले मालामाल होते जा रहे हैं। बिजली की इतनी मॉग होने के बावजूद विभाग का इस कदर घाटे में जाना भी विभाग में खुले आम चल रही लूट की तरफ इशारा करता है। जिसका ठीकरा समय-समय पर विभाग उपभोक्ताओं के सर पर फोड़ता रहता है। बिना सुविधा शुल्क के बिजली का नया कनेक्शन लेना असंभव सा काम है। आवेदक को इतने नियम कानून बता दिए जाते हैं की वो बेचारा ये सोच के हैरान हो जाता है कि कनेक्शन मिलेगा कैसे ? घुमाओदार पेचीदे नियम कानून बताने के बाद किसी माध्यम से आवेदक तक ये बात पहुँचाई जाती है कीफालतू झंझट में पड़ने से अच्छा है की पैसे दे कर काम करा लो और नियम कानून में उलझा के तीन गुने से ज्यादा की रकम वसूल कर खानापूर्ति कर के आवेदक को कनेक्शन दिया जाता है। ये रकम न चाहते हुए भी बेचारे उपभोक्ता को देना पड़ता है ? ये समझ से परे है कि बिजली की इतनी आवश्यकता होने के बावजूद बिजली कनेक्शन लेने के नियम इतने जटिल और पेचीदे क्यों बनाये गए हैं? क्या ये नियम कानून बिजली विभाग की मनसा पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाते? वास्तव में अगर विभाग बिजली की चोरी को रोकना चाहता है तो सबसे पहलेउसको कनेक्शन लेने की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी करना होगा! ट्रांसफार्मर पर लोड खाली न होने की बात और कनेक्शन लेने वाले भवन की दूरी पोल से ४० मीटर अधिक होने की बात तो बिजली विभाग का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र है। ये दो ऐसे बिंदु हैं जो विभाग के कर्मचारियों को मोटी कमाई करते हैं। अगर आपके भवन की दुरी पोल से ४० मीटर से अधिक है तो पोल लगाने से लेकर लाइन खीचने तक का सारा खर्चा तीन गुने फायदे के साथ विभाग आपसे वसूल करेगा और ऊपर से जो अधिकारी कर्मचारी मोटा पैसा लेंगे वो अलग। उदाहरण के तौर पर जो पोल विभाग निजी कम्पनियों से लगभग ४००० में खरीदता है उसके लिए उपभोक्य को लगभग १२००० का भुगतान करना पड़ता है। इसके अलावा ऊपर से जो पैसे वसूला जाएगा वो अलग! बिजली विभाग का हाल देख के तो ऐसा लगता है की ये विभाग जनता की सेवा और जरुरत के लिए नहीं बल्कि सामान्य जनता को लूटने के लिए बनाया गया है। अगर सरल नियमों के साथ सरलता पूर्वक बिजली के वैध कनेक्शन देने की नीति बना दी जाए तो काफी हद तक बिजली की चोरी ऐसे ही रुक जायगी। बजली विभाग का हाल देख कर तो ऐसा लगता है की विभाग चोरी का नहीं खुले आम डकैती का शिकार है। अगर कभी इस डकैती में संलिप्त किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ भूले भटके कोई कार्यवाही करने की कोशिश की भी जाती है तो कोई न कोई विभाग का संगठन उसके बचाओ में खड़ा हो जाता है और लीपा-पोती कर मामले को रफ-दफा कर दिया जाता है। अभी कुछ दिन पूर्व ही लखनऊ के चांदन नाम के इलाके में पूर्व पार्षद की मदद से बिजली चोरी का मामला प्रकाश में आया। विभाग ने छापे मारी कर चोरी को पकड़ा पर पार्षद को किसी प्रकार पूरे प्रकरण से बचा लिया गयाहमारी पग पग की टीम जब इलाके का निरीक्षण करने पहुंची तो चान्दन से कुछ ही दूरी पर पाया गया की पोल से ४० मीटर तक कनेक्शन का नियम बताने वाला विभाग ने काफी दूर तक बांस.बल्लियों पे अवैध कनेक्शन बॉट रखा है। जिसका पैसा विभाग में न जाकर सीधा कर्मचारियों की

जेब में जाता है। इस तरह कई इलाकों में पाया गया की दूर दूर तक बांस बल्लियों के सहारे तारों का जाल बिछा हुआ है जो न केवल अवैध ही है बल्कि इंसान के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है, पर विभाग को इसकी परवाह कहाँ ? ऐसे अवैध कनेक्शन बाता कर महीने के हिसाब से रकम तय कर ली जाती हैऔर विभाग को खुल के चूना लगाया जाता है। जो चीज खुले आम एक साधारण से साधारण इंसान को साफ-साफ देखाई देती है। ये कैसे मान लिया जाए की विभाग उससे बेखबर है ? स्पष्ट है की विभाग की सहमति और मिली भगत से ही सारा खेल चल रहा है। कुछ स्थानीय लोगों से पूंछ-ताछ किया गया तो लोगों ने बताया की विभाग में कनेक्शन लेने गए तो खर्चा बहुत जादा बताया गया तो इसी तरह से कनेक्शन ले लिया गया है और हर महीने विभाग का आदमी आकर फिक्स पैसे ले जाता है और उसकी पूरी जिम्मेदारी है। स्पष्ट है की बिजली चोरी रोकने का अभियान एक दिखावा मात्र है। जब खुले आम चोरी विभाग ही करवा रहा है तो चोरी रोकने का अभियान एक नाटक से ज्यादा कुछ नहीं। समय समय पर सरकार द्वारा की गयी घोषणाओं को भी ये विभाग अपने नियम कानून की जटिलताओं में उलझा कर उनकी बलि चढ़ा देता है। सरकार सामान्य और गरीब नागरिकों की सुविधा और रहत के लिए योजना बनती है पर उसका लाभ उन्हें मिलता नहीं। योजनाओं का लाभ पाने के लिए भी विभाग रकम वसूलता है और सामान्य और गरीब नागरिक कही अपनी शिकायत भी नहीं पंहुचा पाता। कनेक्शन लेना हो, मीटर खराब हो, पोल से लाइन खराब हो जाए, हर एक काम के लिए रेट फिक्स है। पैसे न देने की स्थिति में आप लगाते रहिये विभाग के चक्कर । आवश्यक आवश्यकता होने के कारण मजबूरन उपोभोक्ता को हर काम के लिए नाजायज पैसे देने ही पड़ते हैं। शहर हो या गाँव, किसानी हो या कारखाना, बिजली की आवश्यकता प्राथमिक है। शायद इसी प्राथमिकता का फायदा विभाग खुल के उठाता है। सही मायने में देखा जाए तो विभाग एक प्रकार से उपभोक्ता का शोषण करता है ? निचोड़ता रहता है अपने ही उपभोक्ता को ? उपभोक्ता की हालत मकड़ी के जाल में फसी मक्खी जैसी होती है। विभाग की इस लूट का बोझ आम अच्छे उपभोक्ता को बजली की बढ़ी हुई कीमत के रूप में उठाना पड़ता है। अपने भ्रष्ताचार की कीमत विभाग बिजली का मूल्य बढ़ा कर अच्छे ईमानदार उपभोक्ता से वसूल कर विभाग का घटा पूरा करने की कोशिश करता है। यह ईमानदार उपभोक्ता होने का उसे ईनाम मिलता है। हैरानी की बात ये है की खुले आम विभाग में लूट चल रही है और कोई बोलने वाला नहीं। ये बात साफ संकेत देती है की नीचे से ऊपर तक सभी इस लूट में शामिल है। हाल ही में सीमेंट का पोल बनाने वाले एक निजी कंपनी के मालिक से बात चीत से पता चला की विभाग में पोल सप्लाई कर ऑनलाइन टेंडर होते तो हैं काम उन्ही को मिलता है जो विभाग में कमीशन की सेटिंग बना पाते हैं। ये भी जानकारी मिली की कमीशन सिर्फ सप्लाई में ही नहीं कदम-कदम पर हैं। सप्लाई के बाद जब पेमेंट की बारी आती है तो अकाउंट सेक्शन में भी चेक की रकम के हिसाब से पर्सेट फिक्स है। गुणवत्ता पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर तो और भी चौकाने वाला था। हमे बताया गया की विभाग में गुणवत्ता की माप करने वाले अधिकारी होते हैं जो पोल की क्रशिंग स्टेंथ चेक करते हैं, पर ये प्रक्रिया भी औपचारिकता मात्र होती है। उनका भी प्रति पोल के हिसाब से कमीशन तय होता है वे मात्र औपचारिकता करते हैं। यही कारण है की कई जगहों पर टूटे हुए पोल तो कई जगह पर ऐसे पोल देखने को मिलते हैं जो बुरी तरह से झुके हुए होते हैं जिनमे मजबूती के लिए अंदर डाला गया लोहे का तार नुमा सरिया दिखता रहता है जोकि काफी खतरनाक भी है। इतनी लूट के बाद भी विभाग के कर्मचारियों का पेट नहीं भरता। खेल चालू होता है एडजेस्टमेंट का ? ये वो सप्लाई होती है जो सिर्फ कागज में होती है, वास्तव में ये सप्लाई होती ही नहीं, बस कागज में खरीद बिक्री और कागज में ही जमा खर्च ये ५०-५० प्रतिशत पर की जाती है। यानी जिस पार्टी का बिल विभाग में लगता है ५० प्रतिशत पैसा उसका और ५० प्रतिशत पैसा विभाग के अधिकारी का। इतनी अधाधुंध डकैती के बाद क्यूँ न विभाग घाटे में जाए ? नीचे से ऊपर तक सभी की संलिप्तता होने के कारण ये लूट खत्म हो पाना ही असंभव सा लगता है। यहाँ तो ये कहावत चरितार्थ होती है- 'जब सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का जो लूट साफ - साफ हर किसी को दिख रही है। ये कैसे मान लिया जाए की उच्च पदों पर बैठे विभाग के अधिकारियों और सरकार इन बातों से अनजान है ? ऐसे में क्या आम उपभोक्ता पर विभाग के भ्रष्टाचार का बोझ डालना उचित है?आखिर कब तक विभाग के ही लोग विभाग को लूट लूट कर कंगाल बनाते रहेंगे और कब तक इस लूट का बोझ सरकार और विभाग आम जनता पर डालती रहेगी? कब तक पिसती रहेगी आम जनता, सरकार की गलत नीतियों और विभाग के भ्रष्टाचार के बीच?क्यों विभाग अपने नियम सरल और पारदर्शी नहीं बनाता?इस तरह के अनेकों प्रश्न दिमाग में उपभोक्ता के उठते हैं?

                                                                                             शैलेन्द्र सिंह