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बस सार यही गांव है, बस बाजार यही शहर है।
February 10, 2019 • VED PRAKASH

 

मेरा गांव खो गया ,मेरा शहर आबाद है।

मेरा गांव खो गया ,
मेरा शहर आबाद है।
मेरे गांव में  गली थी,
मेरे शहर में  गली है ।
मेरे गांव में भी मोड़ थे,
मेरे शहर में भी मोड़ है।
वो (गांव) मोड़ मै समझ गया, 
अभी मोड़ ये(शहर) अनजान है।
मेरा..................... ।
मेरे गांव में सड़क थी,
मेरे शहर में सड़क है ।
मेरे गांव में भी धूल थी,
मेरे सड़क में भी धूल थी।
मेरे शहर में न धूल है, 
सड़क में  न धूल है।
मेरे गांव में महक थी,
मेरी सड़क पर महक थी ।
मेरे शहर यह क्या है?
मेरे सड़क में यह क्या है? 
मेरा ...............।


मेरे गांव में भी भीड़ थी, 
सड़क में भी भीड़ थी।
मेरे शहर में भी भीड़ है,
सड़क में भी भीड़ है।
वहां लोगो की भीड़ थी, 
यहां भीड़ में लोग है।
मेरा................।
मोड़ की मुलाकात, व्यथा सब बोल गई ।
गाँव की गवइयाॅ ,सहज सब बोल गई ।
मन का मिजाज,  और मन में उतार गई ।
ठौर खड़े लोग, व्यथा ठौर ही निहार गई ।
मोड़ मेरे शहर के, भीड़ ही उतार गई ।
सूनापन जा रहा, भीड़ ही सवार है।
हर पथिक अकेला,  गुमसुम निहारता।
वेदना व्यथा नही, डरा सा निहारता।
जान के शहर में पहचान कही खो गई।
मेरा..................।


भूख भी थी बहुत, पर कोई भूखा नही।
भोजन था अगर अधिक, पर वह सड़ा नही ।
स्वार्थ अनगिनत थे मगर नाली में पड़ा नही।
बकरी, गाय,बैल-भैस जीव-जंतु सहज थे।
कुत्तो की टोलियाँ गलियों की रोब थी।
जंगल में शेर की दहाड़ गूंज जाती थी ।
व्यथा बहुत थी मगर व्यथित मन नही रहा।
बाजार बहुत दूर थे, बाजार यहां नही रहा।
बस सार यही गांव है, बस बाजार यही शहर है।
मेरा...................।


लौट चला गांव,  मन हुलस-हुलस जात मोर।
गांव की गली ,पूरा गांव घूम आयो।
देखत ही देखत,गांव शहर हो गया।
गांव शहर हो गया, बाजार यहां हो गया।
मेरा गांव ............।

                                                                           ved prakash